श्री महादेव जी बोले तुम लोग राजा प्राचीन बड़ी के पुत्र ह तुम्हारा कल्याण हो तुम जो कुछ करना चाहते हो वह भी मुझे मालूम है इस समय तुम लोगों पर कृपा करने के लिए ही मैंने तुम्हें किस प्रकार दर्शन दिया है जो व्यक्ति अवैध प्रकृति तथा जीव संगीत पुरुष इन दोनों के नियामक भगवान वासुदेव की साक्षात शरण लेता है वह मुझे परम प्रिय है अपने वर्णाश्रम धर्म का भली-भांति पालन करने वाला पुरुष सो जन्म के बाद ब्रह्मा के पद को प्राप्त होता है और इससे भी अधिक होने पर वह मुझे प्राप्त होता है परंतु जो भगवान का भक्त है वह तो मृत्यु के बाद ही सीधे भगवान विष्णु के उस सर्व प्रपंच आती परम पद को प्राप्त हो जाता है रूद्र रूप में स्थित में तथा अन्य अधिकारी देवता अपने अपने अधिकार की समाप्ति के बाद प्राप्त करेंगे तुम लोग भगवत भक्त होने के नाते मुझे भगवान के समान ही प्यारे हो इसी प्रकार भगवान के भक्तों को भी मुझसे बढ़कर और कोई कभी प्रिय नहीं होता अब मैं तुम्हें एक बड़ा ही पवित्र मंगलमय और कल्याणकारी स्तोत्र सुनाता हूं इसका तुम लोग शुद्ध भाव से जब करना।
श्री मैत्री जी कहते हैं जब नारायण परायण करो ना हार गए भगवान शिव ने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े उन राजपूतों को यह स्त्रोत्र सुनाया।
भगवान रुद्र स्तुति करने लगे _भगवान आपका उत्कृष्ट उच्च कोटि के हाथ में ज्ञानियों के कल्याण के लिए निजानंद लाभ के लिए है उसे मेरा भी कल्याण हो आप सदा सर्वदा अपने निर्णय से परम आनंद स्वरूप में ही स्थित रहते हैं ऐसे सर्वात्मक आत्मस्वरूप आपको नमस्कार है आप पदमनाभ हैं समस्त लोगों के आदि कारण है भूत सुक्ष्म रतन मात्रा और इंद्रियों के नियंता शांत एक रस और स्वयं प्रकाश वासुदेव ऐसा चित्र के अधिष्ठाता भी आप ही हैं आपको नमस्कार है आप ही शोक व्यक्त अनंत और मुखाग्नि के द्वारा संपूर्ण लोगों का संघार करने वाले इंकार के अधिष्ठाता संकर्षण पता जगत के पृष्ठ ज्ञान के उद्गम स्थान बुद्धि के विष्ठा था प्रद्युम्न है आपको नमस्कार है आप ही इंद्रियों के स्वामी मनोज तत्व के अधिष्ठाता भगवान अनिरुद्ध हैं आपको बार-बार नमस्कार है आप अपने तेज से जगत् को व्याप्त करने वाले सूर्यदेव हैं पूर्ण होने के कारण आपने अपनी और से नहीं होता आपको नमस्कार है आप स्वर्ग और मोक्ष के द्वार तथा निरंतर पवित्र हृदय में रहने वाले हैं आपको नमस्कार है आप ही स्वर्ण रूप वीर्य से युक्त तथा छात्र कर्म के साधन तथा विस्तार करने वाले अग्निदेव को नमस्कार और देवताओं के हैं तथा तीनों पता है हम आपको नमस्कार करते हैं आप ही समस्त प्राणियों को करने वाले रूप है आपको नमस्कार है। आप समस्त प्राणियों के दे सच्ची और विराट स्वरूप है तथा त्रिलोकी की रक्षा करने वाले मानसिक केंद्रीय और शारीरिक शक्ति रूप शक्ति स्वरूप वायु पुराण है आपको नमस्कार है आप ही अपने गुण शब्द के द्वारा समस्त पदार्थों का ज्ञान कराने वाले तथा बाहर भीतर का भेद करने वाले आकाश है तथा आप ही महान पुण्य से प्राप्त होने वाले परम थे जो मरे स्वर्ग वैकुंठ आदि लोग हैं आपको पुनः पुनः नमस्कार है आप पित्र लोग की प्राप्ति कराने वाले प्रवृत्ति कर्म रूप और देव लोग की प्राप्ति के साधन निवृत्ति कर्म रूप है तथा आप ही धर्म के फलस्वरूप दुखदायक मृत्यु है आपको नमस्कार है नाथ आप ही पुराण पुरुष तथा सांचौर योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण है आप सब प्रकार की कामनाओं की पूर्ति के कारण साक्षात मंत्र मूर्ति और महान धर्म स्वरूप है आप भी ज्ञान शक्ति किसी भी प्रकार की होने वाली नहीं है नमस्कार है नमस्कार।
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